आज कुछ यू देखा तुझे,
जैसे सदियो की प्यास बुझानी हो,
कुछ ऐसी मुस्कुराइ तू भी,
जैसे अपनी प्रीत जन्मो पुरानी हो,
नज़रो के खेल में डूबे,
अनंत समय के पार हो चले थे हम,
इतने समय के बाद भी आज,
ना कभी बिछड़े से यार हो चले थे हम,
फिर वही गुलो का गुलिस्ताँ,
आज मेरे जहाँ में लहराया था,
जब एक सलोने से स्वप्न को मैंने,
आज फिर सच सा होता पाया था,
ना हटी नज़रे एक पल भी,
तेरी नज़ाकत भरी अदाओ से आज,
मिश्री सी तेरी आवाज़ का दीवाना मैं,
अपनी सांसो मे घोल रहा था तेरी जीवंत साज़.
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