बाँध के अपने प्रीत मे मुझको,
आज़ादी की शाम तुम मनाती हो,
बँध कर मेरी सांसो ही मे,
गुलामी का एहसास भी दिलाती हो,
कौन सी आज़ादी का जश्न मनाऊ,
जब तेरी ज़ुल्फो की क़ैद का मैं कायल हूँ,
किस धुन मे मैं खो जाऊ "मेरी जां" ,
जब तेरी मुस्कुराहटो से ही मैं घायल हूँ,
फिर भी आज़ाद है तू मेरे सपनो मे,
बारीशो सी बलखाती और फूलो सी शरमाती सी,
पल पल यू घुलती मेरे एहसासो मे,
हर पल रूह मे आग लगाती सी,
मुबारख हो तुझको तेरा आसमान,
मुझे तेरा बंधन ही भला है,
प्रेम की अनेको तकरारो में,
अपने दिलो का मिलन ही सदा फला है.
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